आनंद सिंह
अतिथि संपादक, वर्ल्ड विजन न्यूज
16 अगस्त को मैं सपरिवार दिल्ली पहुँचा। यात्रा का मुख्य उद्देश्य बेटी का दाखिला एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन में कराना था। वह यहाँ इवेंट मैनेजमेंट में मास्टर डिप्लोमा करेगी। बेटी के भविष्य को लेकर उत्साह था और इसी बहाने दिल्ली को एक बार फिर करीब से देखने का अवसर भी मिला।
17 सितंबर को हमने दिल्ली भ्रमण का कार्यक्रम बनाया। एक स्विफ्ट डिजायर टैक्सी बुक की और सुबह करीब 11 बजे होटल से निकल पड़े। अक्षरधाम मंदिर, लोटस टेंपल, इस्कॉन मंदिर समेत दिल्ली के सात स्थानों पर जाने का कार्यक्रम था। शाम करीब पाँच बजे होटल लौटे। करीब छह घंटे की इस यात्रा में दिल्ली को केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसे महसूस करने की कोशिश भी की।
इस यात्रा में दो चीजें सबसे ज्यादा ध्यान खींचती रहीं। पहली—दिल्ली की ध्वस्त होती यातायात व्यवस्था और दूसरी—कई जगहों पर यह महसूस होना कि इंसान से अधिक पैसे की कीमत है। बात-बात पर झूठ, किए गए वादे से मुकर जाना और सामने वाले को अपने मतलब के लिए इस्तेमाल कर लेना जैसे सामान्य व्यवहार का हिस्सा बनता जा रहा है।
अक्षरधाम मंदिर ने मन मोह लिया। भव्यता, स्थापत्य और वातावरण ने कुछ समय के लिए दिल्ली की भागदौड़ से अलग एक शांत दुनिया में पहुँचा दिया। लेकिन मंदिर से बाहर निकलते ही फिर वही दिल्ली सामने थी—भीड़, ट्रैफिक, हॉर्न और जल्दबाजी।
कुतुब मीनार देखने का भी बड़ा उत्साह था। हम लोग बड़े उत्साह से वहाँ पहुँचे, लेकिन उल्टे पाँव वापस लौटना पड़ा। वजह थी—हर टिकट काउंटर पर सैकड़ों की संख्या में उमड़ी भीड़। यह दृश्य अपने आप में अचरज पैदा करने वाला था। एआई के जमाने में, गुरुवार के दिन, शाम करीब चार बजे कुतुब मीनार के टिकट काउंटरों पर इतनी बड़ी भीड़ क्यों जमा है, यह सवाल सहज ही मन में आया। पर्यटन के अनुभव में तकनीक ने दुनिया को बहुत आगे पहुँचा दिया है, लेकिन यहाँ टिकट लेने की कतार देखकर लगा कि समय जैसे कहीं पीछे छूट गया है।
कुतुब मीनार को बाहर से ही प्रणाम किया और लौट आए। मन में यह जरूर आया कि जिस शहर को देश की राजधानी कहा जाता है, वहाँ किसी ऐतिहासिक धरोहर को देखने के लिए इतनी अव्यवस्था क्यों होनी चाहिए?
दिल्ली से रिश्ता नया नहीं
दिल्ली से मेरा रिश्ता नया नहीं है। पहली बार वर्ष 1996 में दिल्ली आया था। इसके बाद 1999 में दूसरी बार दिल्ली आने का अवसर मिला। फिर 1999 से 2003 तक दर्जनों बार दिल्ली आना-जाना होता रहा।
इसके बाद 2003 से लेकर 2026 तक भी दर्जनों बार दिल्ली आने-जाने का सिलसिला जारी रहा। कभी काम के सिलसिले में, कभी किसी आयोजन के लिए और कभी किसी दूसरे उद्देश्य से दिल्ली आने का अवसर मिलता रहा। इस लंबे अंतराल में दिल्ली को बदलते हुए देखने का मुझे पर्याप्त अवसर मिला है।
वर्ष 2004 के आसपास दिल्ली में हरियाली दिखाई देती थी। साथ ही निर्माण कार्य भी तेजी से चल रहे थे। बहुत कुछ नया बन रहा था और मुझे यह शहर लगातार आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता था।
2004 से 2016 के बीच भी कई बार दिल्ली आने का अवसर मिला। हर बार दिल्ली को कुछ नया जोड़ते और आगे बढ़ते देखा। हाँ, उस समय पंजाब में पराली जलाए जाने का असर दिल्ली की हवा पर दिखाई देने लगा था और स्मॉग की समस्या लगातार बढ़ रही थी।
2016 में एक बड़े अखबार में नौकरी के सिलसिले में दिल्ली आया। मेरा ठहराव गाजियाबाद में था। संयोग ऐसा रहा कि करीब पाँच वर्षों तक किसी न किसी काम से दिल्ली, गाजियाबाद और नोएडा आना-जाना लगा रहा। उस दौरान दिल्ली को बहुत करीब से देखने का अवसर मिला। कोरोना काल में भी इस शहर को नजदीक से महसूस किया।
लेकिन इस बार की दिल्ली कुछ बदली हुई लगी।
मैं इसे किसी राजनीतिक चश्मे से देखने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। तीन दिनों तक दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग हिस्सों में रहने और घूमने के बाद जो महसूस किया, वह यह कि यहाँ पानी की समस्या है। जहाँ पानी उपलब्ध है, वहाँ उसकी गुणवत्ता को लेकर भी सवाल हैं। बिजली कटौती दिखाई देती है। कई जगह सड़कें खराब हैं और ट्रैफिक व्यवस्था की तो हालत ऐसी है कि कई बार समझ में नहीं आता कि आप देश की राजधानी में हैं या किसी छोटे शहर की मुख्य सड़क पर।
कई जगहों पर मुझे लगा कि गोरखपुर, बरेली और मुरादाबाद जैसे शहरों की स्थिति भी कुछ मामलों में दिल्ली से बेहतर है। यह मेरा निजी अनुभव है और जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति इससे सहमत हो।
दिल्ली की वास्तविक स्थिति शायद एक-दो दिन में समझना संभव नहीं है। इसके लिए यहाँ रहना होगा, सड़कों पर चलना होगा, लोगों से मिलना होगा और शहर की रोजमर्रा की जिंदगी को करीब से देखना होगा। सत्ता में कौन है और कौन रहा है, यह राजनीतिक बहस का विषय हो सकता है; लेकिन शहर में क्या बदल रहा है, इसे महसूस करने के लिए किसी राजनीतिक चश्मे की जरूरत नहीं पड़ती।
मेरे मन में बार-बार एक सवाल उठता रहा—आखिर वह दिल्ली कहाँ चली गई, जिसे कभी ‘दिलवालों की नगरी’ कहा जाता था?
इस यात्रा में कई जगहों पर मुझे इसके उलट अनुभव हुआ। स्वार्थ, दिखावा, चापलूसी और अपने मतलब के लिए भरोसे को पीछे छोड़ देने की प्रवृत्ति दिखाई दी। कई बार लगा कि रिश्ते और इंसान बाद में हैं, पैसा पहले।
हो सकता है मेरी यह धारणा किसी और के अनुभव से बिल्कुल अलग हो। लेकिन यात्रा-वृत्तांत का अर्थ ही यही है कि यात्री जो देखता है, वही लिखता है; जो महसूस करता है, उसे शब्द देता है।
एक धार्मिक स्थल पर जाने का भी अवसर मिला। वहाँ स्पष्ट रूप से लिखा था कि परिसर में फोटो नहीं खींचे जा सकते और वीडियो भी नहीं बनाया जा सकता। इसके बावजूद कई लोग फोटो खींच रहे थे और वीडियो बना रहे थे। जिम्मेदार लोगों की नजर भी उन पर गई, लेकिन किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की।
मैंने वह निर्देश पढ़ा। मेरे पास भी मोबाइल था, लेकिन मैंने न फोटो खींची और न वीडियो बनाया। बात छोटी थी, लेकिन उसने एक बड़ी बात सोचने पर मजबूर कर दिया—क्या हम धीरे-धीरे उन नियमों का सम्मान करना भी भूलते जा रहे हैं, जिनका पालन करना हमारे अपने हाथ में है?
नियम लिखा हुआ है, लेकिन उसका पालन कौन करेगा? जिम्मेदार व्यक्ति देख रहा है, लेकिन रोक कौन लगाएगा? शायद यही वह छोटी-सी दरार है, जहाँ से सामाजिक अनुशासन धीरे-धीरे बाहर निकल जाता है।
दिल्ली के स्तर पर देखें तो ऐसी छोटी-छोटी घटनाएँ मिलकर एक बड़ी तस्वीर बनाती हैं। यह तस्वीर केवल सड़कों और इमारतों की नहीं है; यह लोगों के व्यवहार और हमारी बदलती सामाजिक मानसिकता की भी तस्वीर है।
इस यात्रा में एक और छोटी-सी बात ने ध्यान खींचा। कभी दिल्ली के लगभग हर चौराहे और नुक्कड़ पर नींबू पानी मिल जाता था। इस बार वह भी लगभग गायब दिखाई दिया। सच कहूँ तो वह ऐसे गायब हुआ है, जैसे गधे के सिर से सींग!
पत्नी की पुरानी शिकायत भी इस यात्रा के बाद शायद कुछ कम हुई होगी। वह अक्सर कहती थीं—“आपने दिल्ली घुमाई ही नहीं। आप कहीं भी जाते हैं तो घूमते ही नहीं हैं।”
इस बार हमने उन्हें दिल्ली घुमाई। छह घंटे टैक्सी में घूमे, कई जगह गए, भीड़ देखी, ट्रैफिक झेला और दिल्ली के बदलते मिजाज को समझने की कोशिश की। लेकिन लौटते समय मन में एक मलाल जरूर था—टैक्सी वाले को पैसे देकर जिन इलाकों में गए, उनमें से कई जगहों पर न जाते तो शायद ज्यादा बेहतर होता।
पैसे खर्च होने का दुख नहीं था। दुख इस बात का था कि समय और ऊर्जा लगाने के बाद भी कई जगहों ने कोई सुखद स्मृति नहीं दी।
फिर भी मैं इस यात्रा को बेकार नहीं मानता। यात्रा केवल सुंदर इमारतें, मंदिर और पर्यटन स्थल देखने का नाम नहीं है। यात्रा शहरों के बदलते चरित्र को देखने और समाज के बदलते व्यवहार को समझने का भी अवसर देती है।
मैंने दिल्ली को 1996 में पहली बार देखा था। फिर 1999 से 2003 के बीच दर्जनों बार यहाँ आया-जाया। इसके बाद 2003 से 2026 तक भी दिल्ली से मेरा आना-जाना लगातार बना रहा। बीच में 2016 के आसपास नौकरी के सिलसिले में दिल्ली-एनसीआर में लंबे समय तक रहने का अवसर मिला। कोरोना काल में दिल्ली को एक अलग रूप में महसूस किया और अब 2026 में फिर देखा।
हर बार दिल्ली कुछ अलग मिली।
शहर वही है, लेकिन उसकी चाल बदल गई है। सड़कें वही हैं, लेकिन उन पर चलने वालों का व्यवहार बदल गया है। इमारतें खड़ी हैं, लेकिन शायद उनके बीच रहने वाले लोगों की प्राथमिकताएँ बदल गई हैं।
कभी दिल्ली दिलवालों की नगरी हुआ करती थी। आज कई जगहों पर यह फरेब, झूठ, चापलूसी और स्वार्थ से भरी नगरी जैसी प्रतीत होती है।
यह मेरा अनुभव है, अंतिम सत्य नहीं।
आप मेरी बात से असहमत भी हो सकते हैं। शायद दिल्ली आपको आज भी उतनी ही खूबसूरत, उतनी ही आत्मीय और उतनी ही दिलदार लगे। लेकिन मुझे इस यात्रा में जो दिल्ली दिखाई दी, उसे मैं अनदेखा नहीं कर सकता।
क्योंकि यात्रा का सबसे बड़ा सच यही है—हम शहरों को देखने निकलते हैं, लेकिन लौटते समय अक्सर शहर हमें देख चुका होता है।
और इस बार दिल्ली ने मुझे बहुत कुछ दिखाया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इस आलेख के माध्यम से अपनी दिल्ली यात्रा का अनुभव बयां किया है।)

