प्रकाशन के पहले ही दिन पुस्तक ‘द एग्जाम दैट कैनॉट लीक' ने बनाया रिकॉर्ड

Amar Nath Pathak
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एक दिन के भीतर अमेजन इंडिया पर प्रथम स्थान पर पहुंची झारखंड के अधिकारी डॉ. सुदीप कुमार की लिखी पुस्तक


उल्लेखनीय उपलब्धि : पुस्तक का प्रकाशन 20 सितंबर 2026 को हुआ और अमेजन पर पुस्तक के साथ ‘प्रथम बेस्टसेलर’ का उल्लेख प्रदर्शित 


सरल, पारदर्शी और दूरदर्शी परीक्षा व्यवस्था की परिकल्पना ; प्रश्नपत्र लीक रोकने से लेकर ‘उपलब्धि कार्ड’ तक कई नवीन प्रस्ताव


वर्ल्ड विजन न्यूज 

हजारीबाग (झारखंड)। झारखंड सरकार के जल संसाधन विभाग,  हजारीबाग में पदस्थ झारखंड सचिवालय सेवा के अधिकारी एवं लेखक डॉ. सुदीप कुमार की पुस्तक ‘द एग्जाम दैट कैनॉट लीक : मेरिट, ईमानदारी और डिजिटल युग के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं का पुनर्निर्माण’ ने प्रकाशन के मात्र एक दिन के भीतर अमेजन इंडिया पर ‘जनकार्य एवं नीति संबंधी ई-पुस्तकें’ की अपनी संबंधित श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। पुस्तक का प्रकाशन 20 सितंबर 2026 को हुआ है और अमेजन पर पुस्तक के साथ ‘प्रथम बेस्टसेलर’ का उल्लेख प्रदर्शित हो रहा है।

झारखंड में कार्यरत एक सरकारी अधिकारी द्वारा प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था जैसे व्यापक राष्ट्रीय महत्व के विषय पर लिखी गई पुस्तक का प्रकाशन के अगले ही दिन अमेजन इंडिया की संबंधित श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त करना राज्य के लिए भी उल्लेखनीय उपलब्धि है। पुस्तक में प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक की समस्या के समाधान के साथ-साथ पूरी परीक्षा व्यवस्था को सरल, सुरक्षित, पारदर्शी, वैज्ञानिक और अभ्यर्थी-केंद्रित बनाने की व्यापक परिकल्पना प्रस्तुत की गई है।

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सरल और दूरदर्शी सोच पर आधारित है पुस्तक :

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डॉ. सुदीप कुमार की पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी सरल और दूरदर्शी सोच है। लेखक का मानना है कि परीक्षा कठिन हो सकती है, लेकिन परीक्षा की व्यवस्था सरल, स्पष्ट और समान होनी चाहिए। प्रत्येक अभ्यर्थी को समान नियम, समान अवसर और समान परिस्थितियां मिलनी चाहिए तथा परीक्षा का वास्तविक उद्देश्य विद्यार्थी के ज्ञान, समझ, तर्क क्षमता और योग्यता का निष्पक्ष आकलन होना चाहिए।

लेखक ने परीक्षा व्यवस्था को केवल प्रश्नपत्र तैयार करने और परीक्षा आयोजित करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा है। उन्होंने प्रश्न निर्माण से लेकर प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा, उत्तर-पत्रक, मूल्यांकन, परिणाम और अभिलेख संरक्षण तक पूरी व्यवस्था को एक सुरक्षित और पारदर्शी श्रृंखला के रूप में देखने की आवश्यकता बताई है।

उनकी सोच का उद्देश्य ऐसी परीक्षा व्यवस्था तैयार करना है जिसमें विद्यार्थी को अनावश्यक प्रक्रियागत जटिलताओं में उलझना न पड़े और प्रशासन को भी बार-बार अलग-अलग परीक्षाओं के आयोजन में समय, धन और मानव संसाधन खर्च न करना पड़े।

प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए अंतिम समय में प्रश्नपत्र तैयार करने की अभिनव परिकल्पना

पुस्तक की प्रमुख अवधारणा ‘शून्य प्रश्नपत्र-लीक सिद्धांत’ है। लेखक का मानना है कि प्रश्नपत्र लीक होने के बाद दोषियों को पकड़ने और दंडित करने की व्यवस्था से आगे बढ़कर ऐसी परीक्षा प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, जिसमें प्रश्नपत्र लीक होने की संभावना ही न्यूनतम रह जाए।

इसी उद्देश्य से लेखक ने केंद्रीय और राज्य स्तर पर विशेषीकृत परीक्षा एजेंसियों की परिकल्पना प्रस्तुत की है। इन एजेंसियों के माध्यम से प्रश्न निर्माण, सुरक्षित प्रश्न बैंक, प्रश्नों का यादृच्छिक चयन, अंतिम प्रश्नपत्र निर्माण, सुरक्षित मुद्रण, वितरण, उत्तर-पत्रक की स्कैनिंग और मूल्यांकन तक पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित एवं सुरक्षित करने का प्रस्ताव दिया गया है।

पुस्तक में चार चरणों वाली परीक्षा व्यवस्था की परिकल्पना की गई है। इसके प्रथम चरण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नवीन विचार रखा गया है। इसके अनुसार परीक्षार्थियों के परीक्षा केंद्र पर पहुंच जाने के बाद परीक्षा एजेंसी के सुरक्षित प्रश्न बैंक से वैज्ञानिक यादृच्छिकीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से प्रश्नों का अंतिम चयन कर प्रश्नपत्र तैयार किया जाए।

इसके बाद परीक्षा केंद्र पर दो दंडाधिकारियों की निगरानी में सुरक्षित एवं नियंत्रित वातावरण में प्रश्नपत्र का मुद्रण किया जाए और तत्काल परीक्षार्थियों को वितरित किया जाए। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रश्नपत्र की अनावश्यक आवाजाही, मानव हस्तक्षेप और उसके पहले से उपलब्ध होने की अवधि को न्यूनतम करना है।

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परीक्षा समाप्त होते ही उत्तर-पत्रक की सुरक्षित डिजिटल प्रक्रिया : 

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पुस्तक में परीक्षा समाप्त होने के बाद की प्रक्रिया को भी परीक्षा की पवित्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। लेखक ने प्रस्ताव दिया है कि प्रारंभिक परीक्षा समाप्त होते ही उत्तर-पत्रकों की सुरक्षित और तीव्र स्कैनिंग की जाए तथा पूरी प्रक्रिया का वीडियो अभिलेखन रखा जाए।

स्कैनिंग के बाद तैयार डिजिटल अभिलेख को कूटबद्ध करके तत्काल अधिकृत केंद्रीय और राज्य स्तरीय परीक्षा एजेंसियों को भेजने की व्यवस्था की परिकल्पना की गई है। इससे उत्तर-पत्रकों की अनावश्यक भौतिक आवाजाही कम होगी और मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित, तेज और पारदर्शी बनाया जा सकेगा।

लेखक के अनुसार परीक्षा की पवित्रता केवल प्रश्नपत्र की सुरक्षा से सुनिश्चित नहीं होती। प्रश्न निर्माण से लेकर प्रश्नपत्र के अंतिम रूप देने, मुद्रण, वितरण, परीक्षा, उत्तर-पत्रक, मूल्यांकन और परिणाम तक प्रत्येक चरण को सुरक्षित बनाना आवश्यक है।

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सरल, पारदर्शी और एकीकृत परीक्षा प्रणाली

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लेखक ने एक ऐसी सरल, पारदर्शी और एकीकृत परीक्षा प्रणाली की कल्पना की है, जिसमें विद्यार्थियों को बार-बार अलग-अलग परीक्षाओं में शामिल होने की आवश्यकता कम हो तथा एक परीक्षा में अर्जित उपलब्धियों का उपयोग आगे की उपयुक्त अवसर व्यवस्था में भी किया जा सके।

वर्तमान व्यवस्था में बड़ी संख्या में विद्यार्थी वर्षों तक लगातार अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते रहते हैं। अलग-अलग आवेदन, शुल्क, पाठ्यक्रम, परीक्षा केंद्र और परीक्षाओं के कारण विद्यार्थियों तथा उनके परिवारों पर समय और आर्थिक दबाव बढ़ता है। दूसरी ओर प्रशासन को भी बार-बार परीक्षा आयोजित करने में भारी संसाधन लगाने पड़ते हैं।

लेखक की परिकल्पना है कि एक सरल और एकीकृत व्यवस्था के माध्यम से विद्यार्थियों तथा प्रशासन दोनों का समय, धन और श्रम बचाया जा सकता है।

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‘उपलब्धि कार्ड’—असफलता की जगह उपलब्धि को पहचानने की नई सोच :

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पुस्तक की सबसे अलग और दूरदर्शी अवधारणाओं में ‘उपलब्धि कार्ड’ शामिल है। इस विचार की प्रेरणा लेखक के अपने प्रारंभिक परीक्षा अनुभवों से जुड़ी है। लेखक ने महसूस किया कि किसी प्रतियोगी परीक्षा में चयनित नहीं होना किसी विद्यार्थी की पूरी क्षमता, उसकी मेहनत और उसके भविष्य की संभावनाओं को समाप्त नहीं कर देता।

इसी सोच से ‘उपलब्धि कार्ड’ की अवधारणा सामने आती है। इसमें विद्यार्थी को केवल ‘सफल’ या ‘असफल’ की दो श्रेणियों में बांटने के बजाय परीक्षा में उसके द्वारा अर्जित वास्तविक उपलब्धि को पहचानने और प्रमाणित करने की व्यवस्था की परिकल्पना की गई है।

लेखक ने चार प्रकार के उपलब्धि कार्ड—श्वेत, पीला, हरा और गुलाबी—की अवधारणा प्रस्तुत की है। प्रथम स्तर पर बिना ऋणात्मक अंकन के 30 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को श्वेत उपलब्धि कार्ड दिए जाने की परिकल्पना है। इसके बाद परीक्षा के विभिन्न चरणों में प्राप्त उपलब्धियों के आधार पर क्रमशः पीला, हरा और गुलाबी उपलब्धि कार्ड दिए जाने का विचार रखा गया है।

इस अवधारणा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जो विद्यार्थी वर्तमान व्यवस्था में केवल ‘असफल’ कहलाता है, वह इस व्यवस्था में अपनी  उपलब्धि को पहचान सकेगा। उसे यह अनुभव होगा कि उसकी मेहनत उसकी क्षमता के अनुसार रंग लाई है, सरकार ने उसकी क्षमता को मान्यता दी है।

उपलब्धि का यह प्रमाण विद्यार्थी के भीतर आत्मविश्वास पैदा कर सकता है तथा उसे निराशा के बजाय आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा। वह स्वयं को अपनी क्षमता और उपलब्धि वाले युवा के रूप में देख सकेगा।

लेखक की परिकल्पना में उपलब्धि कार्ड विद्यार्थी को यह विश्वास दिलाने का माध्यम बन सकता है कि एक परीक्षा में चयन न होना जीवन की असफलता नहीं है। उसकी अर्जित योग्यता और उपलब्धि के आधार पर उसके सामने आगे बढ़ने के अनेक रास्ते खुले रह सकते हैं।

उपलब्धि के आधार पर रोजगार और नए अवसर

उपलब्धि कार्ड की अवधारणा का अगला महत्वपूर्ण पक्ष रोजगार और अवसरों से जुड़ा है। लेखक की परिकल्पना के अनुसार उपलब्धि कार्ड धारकों को उनकी योग्यता और उपलब्धि के अनुरूप सरकारी योजनाओं, सरकारी क्षेत्र, निजी क्षेत्र, कौशल आधारित रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमिता के अवसरों से जोड़ा जा सकता है।

निजी क्षेत्र को भी इस व्यवस्था में सहभागी बनाकर उपलब्धि कार्ड धारकों को उनकी प्रमाणित क्षमता के अनुरूप रोजगार में प्राथमिकता देने की संभावना पुस्तक में प्रस्तुत की गई है।

इससे ऐसे युवाओं को वर्षों तक केवल अगली प्रतियोगी परीक्षा की प्रतीक्षा करते रहने के बजाय अपनी उपलब्धि के आधार पर रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। वे देश के जनसांख्यिकीय लाभांश को मजबूत करने में भी अपना योगदान दे सकते हैं।

इस प्रकार ‘उपलब्धि कार्ड’ केवल परीक्षा का प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि असफलता की मानसिकता को उपलब्धि, आत्मविश्वास और अवसर की मानसिकता में बदलने का प्रयास है।

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परीक्षा की तैयारी के अंतहीन चक्र को तोड़ने का प्रयास

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लेखक ने बड़ी संख्या में विद्यार्थियों द्वारा वर्षों तक लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते रहने की समस्या को भी गंभीरता से उठाया है। एक परीक्षा के बाद दूसरी परीक्षा और फिर तीसरी परीक्षा—यह क्रम विद्यार्थियों के समय, धन और ऊर्जा पर भारी दबाव डालता है।

पुस्तक में सरल, पारदर्शी और एकीकृत परीक्षा प्रणाली तथा उपलब्धि कार्ड के माध्यम से इस चक्र को तोड़ने का तार्किक समाधान प्रस्तुत किया गया है।

लेखक का विचार है कि विद्यार्थी की एक परीक्षा में अर्जित उपलब्धि को आगे की संभावनाओं से जोड़ा जाए, ताकि प्रत्येक असफलता उसे फिर से शून्य से शुरुआत करने के लिए मजबूर न करे।

निजी क्षेत्र को भी परीक्षा सुधार का सहभागी बनाने की सोच

डॉ. सुदीप कुमार की दूरदर्शी सोच का एक महत्वपूर्ण पक्ष निजी क्षेत्र की भूमिका से जुड़ा है। लेखक का मानना है कि रोजगार की पूरी जिम्मेदारी केवल सरकार के ऊपर नहीं हो सकती। मजबूत और समावेशी निजी क्षेत्र को भी योग्य युवाओं को अवसर देने की प्रक्रिया में सहभागी बनाया जाना चाहिए।

उपलब्धि कार्ड के माध्यम से विद्यार्थियों की प्रमाणित उपलब्धियों को निजी क्षेत्र तक पहुंचाने और उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की परिकल्पना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण विचार है।

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विद्यालय स्तर की नकल संस्कृति पर भी सवाल :

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लेखक ने प्रश्नपत्र लीक की समस्या को केवल परीक्षा एजेंसियों की तकनीकी कमजोरी से जोड़कर नहीं देखा है। पुस्तक में विद्यालय स्तर से विकसित होने वाली नकल और अनुचित साधनों की संस्कृति पर भी गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।

लेखक के अनुसार यदि विद्यार्थी के शैक्षणिक जीवन के प्रारंभिक चरण में ही अनुचित साधनों से सफलता प्राप्त करने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है, तो आगे चलकर प्रतियोगी परीक्षाओं में नकल, अनुचित साधनों और प्रश्नपत्र लीक जैसी समस्याओं के लिए भी वातावरण तैयार हो सकता है।

इसलिए पुस्तक में तकनीकी सुरक्षा के साथ परीक्षा संस्कृति में बदलाव को भी आवश्यक माना गया है। लेखक की दृष्टि में प्रश्नपत्र लीक की समस्या का स्थायी समाधान केवल सुरक्षा व्यवस्था से नहीं, बल्कि ईमानदार परीक्षा संस्कृति और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के वातावरण से संभव है।

लेखक ने एक विद्यार्थी के साथ भी अन्याय न हो कि संकल्पना दी है। इसके तहत किसी वैध कारणों से किसी परीक्षार्थी की परीक्षा छूट जाती है तो जिला प्रशासन की अनुशंसा से उसे उम्र सीमा में एक छूट का प्रावधान किया गया है या फिर नॉर्मलाइजेशन पर आधारित पीटी पुनर्परीक्षा के प्रावधान की संकल्पना दी गई है जो काफी व्यवहारिक प्रतीत हो रही है।

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झारखंड से राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंची नई सोच : 

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डॉ. सुदीप कुमार की पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें किसी एक परीक्षा या किसी एक राज्य की समस्या तक सीमित रहने के बजाय प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था को राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया गया है।

लेखक ने अपने प्रशासनिक अनुभव और परीक्षा संबंधी व्यक्तिगत अनुभवों को व्यापक अध्ययन एवं तार्किक चिंतन के साथ जोड़ते हुए ऐसी व्यवस्था की कल्पना की है, जिसे देश में प्रतियोगी परीक्षा सुधार के संदर्भ में विचार के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है।

उनकी सरल सोच का केंद्र यह है कि परीक्षा व्यवस्था विद्यार्थी को केवल सफल और असफल की दो श्रेणियों में विभाजित करने के बजाय उसकी वास्तविक क्षमता और उपलब्धि को पहचानने वाली हो। वहीं उनकी दूरदर्शी सोच परीक्षा सुधार को तकनीक, रोजगार, निजी क्षेत्र, उद्यमिता और देश के जनसांख्यिकीय लाभांश से जोड़ती है।

प्रकाशन के एक दिन के भीतर अमेजन इंडिया की संबंधित श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त करना इस पुस्तक की राष्ट्रीय स्तर पर मिली शुरुआती पहचान का महत्वपूर्ण संकेत है। झारखंड के लिए यह इसलिए भी उल्लेखनीय है कि राज्य में कार्यरत एक अधिकारी ने प्रतियोगी परीक्षा सुधार जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय पर अपनी मौलिक सोच को पुस्तक के माध्यम से व्यापक मंच तक पहुंचाया है।

डॉ. सुदीप कुमार को इस उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए बधाई देते हुए उनके लेखन, शोध और परीक्षा सुधार के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों की सराहना की गई है तथा उनके उज्ज्वल साहित्यिक, अकादमिक एवं सामाजिक भविष्य की कामना की गई है।

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हाई लेवल कमेटी की बैठक में पुस्तक के आलेख पर होनी चाहिए चर्चा :

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पेपर लीक पर केंद्रीय स्तर पर बनी हाई लेवल कमेटी में इस पुस्तक के आलेख पर चर्चा होनी चाहिए। चूंकि यह पुस्तक पेपर लीक जैसे ज्वलंत मुद्दे और इससे बचाव पर ही आधारित है। इसमें सभी तथ्य काफी महत्वपूर्ण हैं। इससे केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी भी इत्तफाक रखते हैं।



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