संसद में खड़े हो कर कहा था- हम देश को दिवालिया नहीं होने देंगे
राजेश मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार, वर्ल्ड विजन न्यूज
कुछ लोग इतिहास के पन्नो पर शब्दों से नहीं बल्कि अपने कर्मों से अमर हो जाते हैं। जो बोलते कम थे पर जब बोलते थे तब इतिहास लिखते थे। वो पढ़ाते थे लेकिन उनकी आंखों में भारत के विकास का सपना था। शांति और संकल्प के साथ डॉ मनमोहन सिंह नें 1991में संकट में आ चुकी देश की अर्थव्यवस्था को संभाला। श्री सिंह ने संसद में खड़े हो कर कहा हम देश को दिवालिया नहीं होने देंगे।
भारत के 13वें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्म अविभाजित भारत में 26 सितंबर सन् 1932 ई. को 'गाह' नामक गांव में हुआ था। गाह अब पाकिस्तान के पंजाब सूबे में स्थित है। उनकी माता का नाम अमृत कौर और पिता का नाम गुरुमुख सिंह था। मनमोहन सिंह एक कुशल राजनेता के साथ-साथ एक अच्छे विद्वान, अर्थशास्त्री और विचारक भी हैं। मनमोहन सिंह की पत्नी का नाम गुरशरण कौर है। मनमोहन सिंह ने अपनी बुद्धिमानी से कई उच्च पद की गरिमा को बनाए रखा। मनमोहन सिंह लोकसभा चुनाव 2009 में मिली जीत के बाद जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन गने जिनको सफलतापूर्वक पाँच वर्षों का कार्यकाल पूरा करने के बाद लगातार प्रधानमंत्री बनने का दूसरी बार अवसर मिला। 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक मनमोहन सिंह ने नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्त मंत्री के रूप में भी कार्य किया। मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में भारत में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की।
मनमोहन सिंह ने सन् 1952 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से बी.ए. (ऑनर्स) किया, सन् 1954 में मनमोहन सिंह ने इसी यूनिवर्सिटी से एम. ए. इकॉनॉमिक्स से किया। मनमोहन सिंह इसके बाद कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गये। जहाँ से उन्होंने पी. एच. डी. की। मनमोहन सिंह को सन् 1955 और 1957 में कैंब्रिज के सेंट जॉन्स कॉलेज में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए 'राइट्स पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। मनमोहन सिंह ने 'नफील्ड कॉलेज' (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी) से डी. फिल. पास किया। उनकी पुस्तक 'इंडियाज़ एक्सपोर्ट ट्रेंड्स एंड प्रोस्पेक्ट्स फॉर सेल्फ सस्टेंड ग्रोथ' भारत के अन्तर्मुखी व्यापार नीति की पहली और सटीक आलोचना मानी जाती है।
1985 में राजीव गांधी के शासन काल में मनमोहन सिंह को भारतीय योजना आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस पद पर उन्होंने निरन्तर पाँच वर्षों तक कार्य किया, जबकि 1990 में यह प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार बनाए गए। जब पी वी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने मनमोहन सिंह को 1991 में अपने मंत्रिमंडल में सम्मिलित करते हुए वित्त मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंप दिया। इस समय डॉ॰ मनमोहन सिंह न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा के सदस्य थे। लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार सरकार के मंत्री को संसद का सदस्य होना आवश्यक होता है। इसलिए उन्हें 1991 में असम से राज्यसभा के लिए चुना गया।
मनमोहन सिंह ने बीमार पड़े अर्थव्यवस्था को आर्थिक उदारीकरण रूपी उपचार के रूप में प्रस्तुत किया और भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाज़ार के साथ जोड़ दिया। डॉ मनमोहन सिंह ने आयात और निर्यात को भी सरल बनाया। लाइसेंस एवं परमिट गुज़रे ज़माने की चीज़ हो गई। निजी पूंजी को उत्साहित करके रुग्ण एवं घाटे में चलने वाले सार्वजनिक उपक्रमों हेतु अलग से नीतियाँ विकसित कीं। नई अर्थव्यवस्था जब घुटनों पर चल रही थी, तब पी. वी. नरसिम्हा राव को कटु आलोचना का शिकार होना पड़ा। विपक्ष उन्हें नए आर्थिक प्रयोग से सावधान कर रहा था। लेकिन श्री राव ने मनमोहन सिंह पर पूरा यक़ीन रखा।मात्र दो वर्ष बाद ही आलोचकों के मुँह बंद हो गए और उनकी आँखें फैल गईं। उदारीकरण के बेहतरीन परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था में नज़र आने लगे थे और इस प्रकार एक ग़ैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति जो अर्थशास्त्र का प्रोफ़ेसर था, का भारतीय राजनीति में प्रवेश हुआ जो देश की बिगड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया ।
1982 से 1985 तक श्री सिंह रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे। इस दौरान बैंकिंग से संबंधित विभिन्न कानूनी सुधारों की देखरेख की ।
सन 1987 में पद्म विभूषण के अतिरिक्त भारत के सार्वजनिक जीवन में डॉ॰ सिंह को अनेकों पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं जिनमें प्रमुख हैं: -
2002 - सर्वश्रेष्ठ सांसद
1995 में इण्डियन साइंस कांग्रेस का जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार,
1993 और 1994 का एशिया मनी अवार्ड फॉर फाइनेन्स मिनिस्टर ऑफ द ईयर,
1994 का यूरो मनी अवार्ड फॉर द फाइनेन्स मिनिस्टर आफ़ द ईयर,
1956 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का एडम स्मिथ पुरस्कार
डॉ॰ सिंह ने कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। अपने राजनैतिक जीवन में वे 1991 से राज्य सभा के सांसद तो रहे ही, 1998 से 2004 तक संसद में विपक्ष के नेता भी रह चुके हैं।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का निधन 26 दिसंबर 2024 को हुआ।

