4 अक्टूबर : जयमंगल पांडेय की शहीदी दिवस पर विशेष

Amar Nath Pathak
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जयमंगल पाण्डेय, जिन्होंने डोरंडा की छावनी को दी विद्रोह की आवाज

1857 के महासंग्राम में छोटानागपुर की धरती से उठी एक ऐसी सैन्य चेतना, जिसने अंग्रेजी सत्ता को दी चुनौती 

डाॅ. शत्रुघ्न कुमार पाण्डेय
अतिथि संपादक, वर्ल्ड विजन न्यूज 

1857 के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा होते ही हमारे सामने मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी और बिहार में कुँवर सिंह की वीरगाथाएँ उभरती हैं। लेकिन इस व्यापक संघर्ष की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी छोटानागपुर की धरती पर भी विकसित हुई थी। इस कड़ी के केंद्र में एक ऐसा नाम था, जिसे लंबे समय तक राष्ट्रीय इतिहास की मुख्यधारा में अपेक्षित स्थान नहीं मिला। यह नाम है सूबेदार जयमंगल पाण्डेय का। जयमंगल पाण्डेय केवल डोरंडा छावनी के एक सैनिक अधिकारी नहीं थे। वे उस दौर के ऐसे अनुभवी भारतीय सैनिक थे, जिन्होंने लगभग चार दशकों तक औपनिवेशिक सेना की कार्यप्रणाली को भीतर से देखा था और 1857 में उसी सैन्य अनुभव को अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध मोड़ दिया। उनकी कहानी इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इसमें एक सैनिक का धीरे-धीरे विद्रोही सेनानायक में बदलना दिखाई देता है।
 जयमंगल पाण्डेय का जन्म लगभग 1793 में हजारीबाग के खीरगांव में हुुआ था। 1857 में गिरफ्तारी के समय उनकी आयु लगभग 64 वर्ष थी। वह महापात्र ब्राह्मण परिवार से थे और उनके परिवार की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि कर्मकांडी परंपरा से जुड़ी हुई थी। लेकिन जयमंगल पाण्डेय के जीवन की सबसे निर्णायक पहचान उनका सैनिक जीवन था। 1818 में उन्होंने रामगढ़ बटालियन में सैनिक के रूप में प्रवेश किया। लंबे सैन्य जीवन ने उन्हें केवल हथियार चलाने का अनुभव ही नहीं दिया, बल्कि सैनिक संगठन, अनुशासन, रसद, खजाने, छावनी व्यवस्था और सैन्य नेतृत्व की गहरी समझ भी दी। समय के साथ वे सूबेदार के पद तक पहुँचे और डोरंडा छावनी के भारतीय सैनिकों में प्रभावशाली अधिकारी बन गए। उनकी विश्वसनीयता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छावनी के महत्त्वपूर्ण खजाने और कोषागार की जिम्मेदारी उन पर थी। 1857 से पहले तक अंग्रेज अधिकारियों की दृष्टि में वे भरोसेमंद भारतीय सैनिक अधिकारी थे। यही कारण था कि जब हजारीबाग और आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजों को भारतीय सैनिकों की निष्ठा पर संदेह होने लगा, तब भी जयमंगल पाण्डेय जैसे अधिकारी को महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ दी जाती रहीं। 
यहीं से उनकी कहानी में एक बड़ा मोड़ आता है। 1857 का विद्रोह उनके लिए केवल सैनिक असंतोष नहीं था। डोरंडा छावनी के सैनिकों में असंतोष बढ़ रहा था और देश के दूसरे हिस्सों में हो रही घटनाओं की खबरें यहाँ तक पहुँच रही थीं। जयमंगल पाण्डेय ने इस वातावरण को समझा और सैनिकों को संगठित करने में सक्रिय भूमिका निभाई। 2 अगस्त 1857 को डोरंडा छावनी में विद्रोह की चिंगारी भड़की। यह केवल एक छावनी का अनुशासन-भंग नहीं था, इसके पीछे व्यापक राजनीतिक बेचैनी थी। जयमंगल पाण्डेय की भूमिका इस विद्रोह को व्यापक क्षेत्रीय आंदोलन से जोड़ने में दिखाई देती है। उन्होंने डोरंडा के सैनिकों को बिहार और छोटानागपुर के अन्य विद्रोही केंद्रों से जोड़ने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य केवल छावनी पर अधिकार करना नहीं था, बल्कि सैनिक शक्ति को एक बड़े प्रतिरोध में बदलना था।
इसी क्रम में राजा विश्वनाथ शाहदेव और गणपत राय जैसे स्थानीय नेताओं के साथ संबंध मजबूत हुए। राँची में एक स्वतंत्र प्रशासन की स्थापना का प्रयास हुआ और डोरंडा की सैनिक शक्ति उस व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण आधार बनी। जयमंगल पाण्डेय को इस व्यवस्था में कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। यह तथ्य उनके संगठनात्मक कौशल की ओर संकेत करता है। वे केवल युद्धभूमि के सैनिक नहीं थे, वे प्रशासन और सैन्य संगठन की व्यावहारिक आवश्यकताओं को भी समझते थे। जयमंगल पाण्डेय की दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे सैनिकों की आर्थिक स्थिति को भी समझते थे। विद्रोही सैनिकों को लंबे समय से वेतन और भत्ते नहीं मिले थे। वे जानते थे कि आर्थिक संकट सैनिक एकता को कमजोर कर सकता है। इसलिए सैनिकों के वेतन की व्यवस्था करने का प्रयास किया गया। उनके लिए विद्रोह केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं था, उसमें संगठन, संसाधन और सैनिक अनुशासन की आवश्यकता भी थी। उनकी रणनीतिक सोच का एक और पहलू था, डोरंडा की सैन्य शक्ति को कुँवर सिंह की सेना से जोड़ना। बिहार के सैनिकों और डोरंडा छावनी के विद्रोहियों के बीच संपर्क बढ़ रहा था। जयमंगल पाण्डेय का विचार था कि सैनिक शक्ति को छोटानागपुर से आगे बढ़ाते हुए कुँवर सिंह की सेना के साथ जोड़ा जाए। इससे विद्रोह को एक व्यापक सैन्य आधार मिल सकता था।
सितंबर 1857 तक परिस्थितियाँ तेजी से बदलने लगीं। विद्रोही सैनिकों के सामने रसद, हथियार, धन और स्थानीय समर्थन की कठिनाइयाँ बढ़ती गईं। इसके बावजूद जयमंगल पाण्डेय ने नेतृत्व नहीं छोड़ा। उनकी आयु लगभग 64 वर्ष थी, लेकिन वे लगातार सैनिकों के बीच सक्रिय रहे। उनके लिए उम्र नेतृत्व की बाधा नहीं बनी।
फिर आया 2 अक्टूबर 1857 का चतरा युद्ध। चतरा की लड़ाई छोटानागपुर के 1857 विद्रोह की निर्णायक घटनाओं में से एक बनी। अंग्रेजी सेना ने विद्रोही सैनिकों पर संगठित हमला किया। संघर्ष अत्यंत तीव्र था। विद्रोही सैनिकों ने प्रतिरोध किया, लेकिन अंततः अंग्रेजी सेना को बढ़त मिली। लड़ाई के बाद जयमंगल पाण्डेय और उनके साथी सूबेदार नादिर अली पकड़े गए। जयमंगल पाण्डेय की गिरफ्तारी के बाद अंग्रेज अधिकारियों ने उनसे पूछताछ की। उनसे विद्रोह के कारणों और उनके साथियों के बारे में जानकारी लेने का प्रयास किया गया। लेकिन उन्होंने अपने साथियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने संबंधों को छिपाने का प्रयास किया और अंग्रेज अधिकारियों के सामने अपने संगठन की पूरी तस्वीर उजागर नहीं होने दी।
यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व के एक दूसरे पक्ष को सामने लाता है और वह गोपनीयता, आत्मसंयम और अपने साथियों के प्रति निष्ठा। अंततः 4 अक्टूबर 1857 को चतरा में उन्हें साथियों के साथ फाँसी दे दी गई। लेकिन जिस व्यक्ति को अंग्रेजी शासन ने विद्रोही सैनिक और राजद्रोही के रूप में देखा, वही व्यक्ति स्थानीय स्मृति में स्वतंत्रता संघर्ष के सेनानी के रूप में जीवित रहा। 
जयमंगल पाण्डेय की कहानी इसलिए विशेष है कि उन्होंने जिस सत्ता की सेना में लगभग चार दशक सेवा की, उसी सत्ता के विरुद्ध अपने जीवन के अंतिम चरण में हथियार उठा लिए। उनके सामने व्यक्तिगत सुरक्षा का रास्ता भी था। वे छावनी के भरोसेमंद अधिकारी थे, उनके पास सैन्य अनुभव था और अंग्रेजी व्यवस्था में उनकी प्रतिष्ठा थी। फिर भी उन्होंने उस रास्ते को छोड़कर विद्रोह का मार्ग चुना। उनका जीवन हमें 1857 को केवल सैनिक विद्रोह के रूप में देखने से आगे ले जाता है। जयमंगल पाण्डेय के माध्यम से 1857 में सैनिक अनुभव, स्थानीय समाज, क्षेत्रीय नेतृत्व और व्यापक स्वतंत्रता चेतना के बीच बनते संबंधों को समझा जा सकता है। आज खीरगाँव और चतरा की स्मृतियों में जयमंगल पाण्डेय का नाम जीवित है। उनके जीवन से जुड़ी अनेक बातें अभी भी गहन शोध की प्रतीक्षा करती हैं। उनका जन्म, प्रारंभिक शिक्षा, सैनिक जीवन के विभिन्न चरण और 1857 से पहले उनके राजनीतिक संपर्कों पर और अधिक सामग्री सामने आना आवश्यक है। फिर भी उपलब्ध सामग्री से इतना स्पष्ट है कि जयमंगल पाण्डेय 1857 के उस इतिहास की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं, जिसमें छोटानागपुर की छावनियों के सैनिकों ने अपने सैन्य कौशल को औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध में बदल दिया था। 
उनकी अंतिम यात्रा चतरा में समाप्त हुई, लेकिन उनकी कहानी वहीं समाप्त नहीं होती। वह आज भी यह सवाल पूछती है कि जिस सैनिक को कभी साम्राज्य ने अपना विश्वसनीय प्रहरी माना था, आखिर वही प्रहरी एक दिन साम्राज्य की दीवारों के विरुद्ध क्यों खड़ा हो गया? जयमंगल पाण्डेय का जीवन इसी प्रश्न का एक ऐतिहासिक उत्तर है कि कभी-कभी इतिहास की सबसे निर्णायक आवाज उसी व्यक्ति से आती है, जिसे सत्ता ने सबसे अधिक भरोसे के योग्य समझा हो। 
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जयमंगल पाण्डेय और चतरा का युद्ध
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डॉ. शत्रुघ्न कुमार पाण्डेय
अतिथि संपादक, वर्ल्ड विजन न्यूज 
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चतरा की धरती पर 2 अक्टूबर 1857 की सुबह अभी पूरी तरह खुली भी नहीं थी कि एक सूचना ने क्रांतिकारी शिविर की शांति भंग कर दी—अंग्रेजी सेना निकट पहुँच चुकी थी। कुछ ही देर बाद बंदूकों की आवाज, तोपों की गर्जना और सैनिकों की पुकार ने उस भूभाग को युद्धभूमि में बदल दिया। लेकिन चतरा में उस दिन जो हुआ, वह अचानक घटित हुई एक लड़ाई नहीं थी। उसके पीछे डोरंडा की छावनी से उठी क्रांति की चिंगारी, राँची में बनी प्रतिरोध की स्थिति, बिहार के क्रांतिकारी केंद्रों से जुड़ने की योजना और अंग्रेजी संचार-व्यवस्था की जीवनरेखा पर प्रहार की रणनीति थी। इस पूरी कड़ी के केंद्र में थे—रामगढ़ बटालियन के सूबेदार जयमंगल पाण्डेय।
इस कहानी की पहली कड़ी 2 अगस्त 1857 को डोरंडा छावनी से जुड़ती है। रामगढ़ बटालियन के सैनिकों ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध हथियार उठाए। जयमंगल पाण्डेय उस समय बटालियन के प्रमुख भारतीय सैनिक अधिकारियों में थे। डोरंडा और राँची में क्रांतिकारी प्रभाव स्थापित होने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि इस संघर्ष को आगे कैसे बढ़ाया जाए। केवल एक छावनी में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देना पर्याप्त नहीं था। आवश्यकता थी कि क्रांतिकारी शक्ति दूसरे केंद्रों से जुड़े और अंग्रेजों की सैनिक आवाजाही तथा संचार-व्यवस्था को बाधित किया जाए।
यहीं से चतरा का महत्व सामने आता है। चतरा उन मार्गों से जुड़ा था, जो छोटानागपुर को बिहार और उत्तर भारत से जोड़ते थे। विशेष रूप से ग्रैंड ट्रंक रोड कंपनी शासन के लिए सैनिक आवाजाही और संचार की महत्वपूर्ण धुरी थी। इस मार्ग पर प्रभाव स्थापित करना अंग्रेजी सैन्य व्यवस्था की गति को बाधित कर सकता था। योजना केवल चतरा तक पहुँचने की नहीं थी। इसके आगे कुँवर सिंह की सेना और भागलपुर की घुड़सवार शक्ति से संपर्क स्थापित करने की आकांक्षा थी, ताकि छोटानागपुर का क्रांतिकारी संघर्ष बिहार के व्यापक प्रतिरोध से जुड़ सके।
इसी उद्देश्य से 11 सितंबर 1857 को डोरंडा से क्रांतिकारी सैनिक चतरा की ओर रवाना हुए। लगभग उन्नीस दिनों की कठिन यात्रा के बाद वे चतरा पहुँचे। रामगढ़ बटालियन के लगभग 440 सैनिक इस दल में थे। उनके साथ स्थानीय स्तर पर जुटे सैनिक और सहयोगी भी थे। चतरा पहुँचकर उन्होंने पुराने जेल के निकट एक ऊँचे स्थान पर अपना शिविर बनाया। अब तक डोरंडा की छावनी से उठी चुनौती एक संगठित सैन्य अभियान का रूप ले चुकी थी।
अंग्रेजी प्रशासन भी इस गतिविधि से अनजान नहीं था। उसकी ओर से यूरोपीय सैनिकों के साथ रैट्रे की सिख टुकड़ी आगे बढ़ रही थी। उनके पास आधुनिक एनफील्ड राइफलें थीं। दूसरी ओर क्रांतिकारी सैनिकों के पास चार तोपें थीं, लेकिन आधुनिक हथियारों की तुलना में उनकी सैन्य क्षमता सीमित थी। इस असमानता के बावजूद क्रांतिकारी नेतृत्व को अपने सैन्य अनुभव और स्थानीय भूगोल पर भरोसा था।
फिर आया एक अक्टूबर। शाम के समय एक ग्रामीण ने जयमंगल पाण्डेय को सूचना दी कि अंग्रेजी और सिख सैनिक डोरी गाँव तक पहुँच चुके हैं। जयमंगल पाण्डेय ने सूचना की पुष्टि कराई और उसे क्रांतिकारी नेतृत्व के सामने रखा। लेकिन इस चेतावनी को वह गंभीरता नहीं मिली, जिसकी आवश्यकता थी। शिविर पूरी तरह युद्ध के लिए तैयार नहीं हो सका। अगले दिन की सुबह इसी चूक की कीमत चुकानी थी।
2 अक्टूबर 1857 को लगभग नौ बजे अंग्रेजी सेना ने क्रांतिकारी शिविर पर अचानक हमला कर दिया। शिविर में उस समय सभी सैनिक युद्ध-सज्जा में नहीं थे। कुछ विश्राम कर रहे थे, कुछ बाहर थे और एक टुकड़ी मुख्य दल से अलग थी। अंग्रेजी सेना ने तेजी से बढ़कर क्रांतिकारी शिविर पर दबाव बनाया। अलग हुई टुकड़ी जब वापस लौटने लगी, तो उसे रास्ते में रोक दिया गया। इस प्रकार क्रांतिकारी सैनिकों को एक साथ संगठित होकर मोर्चा लेने का पूरा अवसर नहीं मिला।
लेकिन हमला अचानक था, प्रतिरोध नहीं। क्रांतिकारी सैनिकों ने मोर्चा संभाल लिया। चारों तोपें गरजीं। बंदूकों की आवाज और तोपों की गर्जना के बीच चतरा की धरती पर घमासान शुरू हो गया। कुछ समय के लिए अंग्रेजी सेना को भी कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। अब युद्ध का केंद्र उन चार तोपों पर आ गया था। दोनों पक्ष जानते थे कि उनका नियंत्रण युद्ध की दिशा बदल सकता है।
अंग्रेजी सैनिक तोपों की ओर बढ़े और क्रांतिकारियों ने उन्हें रोकने के लिए पूरी शक्ति लगा दी। इसी संघर्ष में सूबेदार नादिर अली तोप चलाते समय पैर में गोली लगने से घायल हो गए। तोपों की रक्षा कमजोर पड़ गई और अंततः अंग्रेजी सेना ने उन पर कब्जा कर लिया। इसके साथ ही युद्ध का संतुलन तेजी से बदलने लगा।
अब आधुनिक एनफील्ड राइफलों की मारक क्षमता और संगठित अंग्रेजी सैन्य शक्ति के सामने क्रांतिकारी सैनिकों की स्थिति कठिन होती गई। कई सैनिक मारे गए, अनेक घायल हुए और कुछ पीछे हटने लगे। लेकिन इसी निर्णायक क्षण में जयमंगल पाण्डेय का नेतृत्व अपनी सबसे तीखी रोशनी में दिखाई देता है। 150 से अधिक सैनिकों के युद्धभूमि छोड़ने के बाद भी जयमंगल पाण्डेय ने अपना मोर्चा नहीं छोड़ा।
साथी कम होते गए। तोपें हाथ से निकल गईं। गोलियों की बौछार बढ़ती गई। युद्ध का परिणाम धीरे-धीरे सामने आने लगा। फिर भी जयमंगल पाण्डेय मैदान में डटे रहे। अंततः क्रांतिकारी सेना को पीछे हटना पड़ा। अनेक सैनिक जंगलों और आसपास के क्षेत्रों की ओर निकल गए। कुछ घायल हुए और कई गिरफ्तार कर लिए गए। चतरा की लड़ाई समाप्त हो गई, लेकिन जयमंगल पाण्डेय की तलाश अभी बाकी थी।
अंग्रेज जानते थे कि युद्धभूमि से बचे प्रमुख सैनिक नेतृत्वकर्ताओं को यदि पकड़ लिया गया, तो क्रांतिकारी गतिविधियों के पुनर्गठित होने की संभावना बनी रहेगी। इसलिए युद्ध के अगले ही दिन उनकी खोज तेज कर दी गई। 3 अक्टूबर 1857 को जयमंगल पाण्डेय और नादिर अली गिरफ्तार कर लिए गए। एक दिन पहले तक जो दोनों सैनिक अपने साथियों के साथ युद्धभूमि में खड़े थे, अब औपनिवेशिक सत्ता के बंदी थे। उनसे पूछताछ हुई। उनके बयानों से क्रांतिकारी गतिविधियों और विभिन्न केंद्रों के बीच संपर्क की जानकारी अंग्रेज अधिकारियों को मिली। लेकिन कंपनी सरकार केवल जानकारी हासिल करके रुकने वाली नहीं थी। उसके लिए यह दमन और भय का प्रश्न भी था।
अगली सुबह—4 अक्टूबर 1857—जयमंगल पाण्डेय और नादिर अली को फाँसी दे दी गई।
इस घटना की सबसे मार्मिक विडंबना यही है कि 2 अक्टूबर को जिस धरती पर दोनों ने हथियार उठाकर अंग्रेजी सेना का सामना किया था, उसी धरती पर दो दिन बाद वे औपनिवेशिक सत्ता के सामने कैदी के रूप में खड़े थे। फाँसी के बाद उनके शवों को निकट के तालाब में फेंक दिया गया। बाद की स्थानीय स्मृति में यह स्थान ‘फाँसी तालाब’ के नाम से जाना गया।
ब्रिटिश अभिलेखों में जयमंगल पाण्डेय और उनके साथियों को ‘विद्रोही’ कहा गया, क्योंकि वे कंपनी सरकार की सत्ता के विरुद्ध हथियारबंद संघर्ष कर रहे थे। लेकिन स्वतंत्र भारत की ऐतिहासिक दृष्टि में उनकी पहचान उस औपनिवेशिक शब्दावली से तय नहीं होती। वे क्रांतिकारी सैनिक थे—ऐसे सैनिक जिन्होंने विदेशी सत्ता को चुनौती दी और अपने प्राण दिए। इसलिए चतरा के संघर्ष को केवल औपनिवेशिक प्रशासन की भाषा में दर्ज ‘विद्रोह’ मानना उसके ऐतिहासिक अर्थ को सीमित करना होगा।
चतरा का युद्ध दरअसल घटनाओं की एक क्रमबद्ध कड़ी था—2 अगस्त का डोरंडा, 11 सितंबर का चतरा की ओर प्रस्थान, 1 अक्टूबर की चेतावनी, 2 अक्टूबर का युद्ध, 3 अक्टूबर की गिरफ्तारी और 4 अक्टूबर की शहादत। इन तिथियों को एक साथ रखिए तो छोटानागपुर में 1857 के क्रांतिकारी संघर्ष की पूरी तस्वीर सामने आती है।
जयमंगल पाण्डेय की सबसे बड़ी पहचान शायद उनकी फाँसी नहीं, बल्कि उनका अंतिम मोर्चा है। जब साथी पीछे हट रहे थे, हथियार कम पड़ रहे थे और युद्ध का परिणाम सामने दिखाई दे रहा था, तब भी उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा। इतिहास में ऐसे क्षण किसी युद्ध की जीत-हार से कहीं अधिक गहरी स्मृति छोड़ जाते हैं।
आज चतरा में न तोपों की गर्जना सुनाई देती है, न बारूद का धुआँ दिखाई देता है। समय ने युद्धभूमि का दृश्य बदल दिया है। लेकिन स्मृति की अपनी आवाज होती है। वह आवाज उन कदमों को फिर सामने ले आती है, जो कभी इस धरती पर औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देने के लिए बढ़े थे।
2 अक्टूबर को चतरा में युद्ध समाप्त हुआ था; 4 अक्टूबर को जयमंगल पाण्डेय की शहादत ने उस संघर्ष को स्मृति में स्थायी कर दिया।
चतरा की धरती आज भी उस इतिहास को अपने भीतर सँजोए है—एक युद्ध की स्मृति, एक सैनिक नेता की दृढ़ता और उन क्रांतिकारी साथियों की मौन उपस्थिति, जिनके नाम इतिहास के प्रत्येक पन्ने पर समान रूप से दर्ज भले न हों, लेकिन जिनके संघर्ष के बिना 1857 की कहानी पूरी नहीं होती।  

(डॉ. पाण्डेय इतिहास के प्रोफेसर एवं झारखंड के इतिहास की गुमनाम कड़ियों के शोधकर्ता हैं। वे ‘अमर सेनानी जयमंगल पाण्डेय और रामगढ़ बटालियन का स्वातंत्र्य समर’ के लेखक हैं।)
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